ये कैसा विकास है ???

हरीश रावत के खाते में यह उपलब्धि दर्ज कर दी जाए कि उन्होंने पहाड़ वालों को बाउंसर दिखवाये.हम पहाड़ी लोग कतई पिछड़े हुए हैं.हमारी यह हालत है कि हम में से कईयों ने 1994 तक कर्फ्यू नहीं देखा हुआ था.उत्तराखंड आन्दोलन में कर्फ्यू लगा तो बहुतेरे लोग गाँव से शहर पहुँच गए कि देखें कर्फ्यू कैसा होता है ! ट्रेन देखने भी हमें सुदूर मैदानों की तरफ आना पड़ता है.क्या कमाल है हमारे पास रेल पुरुष तो है पर रेल नहीं है ! लेकिन रेल पुरुष भी हमारे पास कहाँ है ?वो पहले कांग्रेस के पास थे,अब भाजपा के पास हैं. लेकिन हुए क्या साहब ये बाउंसर? धनपिपासु,धन पशु प्रजाति के लोग अपनी हेकड़ी बनाए रखने के लिए कुछ लम्बे-चौड़े,छठे हुए मुस्टंडों को पालते हैं.उन्हें अंग्रेजों की नफासत भरी जुबान में बाउंसर कहा जाता है.एक ज़माना था,जब देश में जमींदार थे.जमींदार भी मुस्टंडे पालते थे,जिन्हें लठैत कहा जाता था.जमींदारी कानूनन हटा दी गई है,सो लठैत भी रद्द हो गए.चूँकि धनपशु लोग कानून के बड़े पाबन्द लोग हैं. वे जमीन कब्जाते नहीं हैं.जमीन हडपने का कानून बनवाते हैं.वे, जमीनें देश के विकास के लिए हडपते हैं.इसलिए जो जमीन नहीं हड़पवाना चाहते हैं,वे सब देशद्रोही हैं.कानून के पाबन्द धनपशुओं ने कानूनन रद्द किये जा चुके लठैत नहीं पाले हैं.वे अंग्रेजियत से लबरेज हैं.अंग्रेजी तौर-तरीके से रहते हैं,अंग्रेजी बतियाते हैं.दारु पीते नहीं हैं,ड्रिंक करते हैं !इसलिए वे न तो देसी सडक छाप गुंडे पालते हैं,न जमीन्दारों के जमाने के आउट डेटेड लठैत.वे तो बाउंसर रखते हैं.क्रिकेट के मारे इस देश में तो लोग समझते थे कि गेंदबाज ही गेंद पटक कर बल्लेबाज पर बाउंसर फेंक सकता है.लेकिन हरीश रावत की कृपा से हम बैकवर्ड पहाड़ियों ने भी जाना कि लोगों पर बाउंसर, जिंदल भी चला सकता है.इसके लिए गेंदबाज होना जरुरी नहीं है.(बाउंसर महिमा, देश के कई हिस्सों में लोग पहले ही जान चुके हैं)जिंदल बाउंसर चलाता नहीं है,बल्कि लोगों पर छुल्या देता है.जैसे उत्पाती बंदरों पर लोग गांवों में कुकुर छुल्या देते हैं.पूँजी के भी क्या अजब शौक है,इंसान को अपना पालतू बनाने में भी उसे आनंद की अनुभूति होती है. हम पहाड़ी कुछ नहीं समझते.हरीश रावत 14 साल मुख्यमंत्री बनने के लिए,मरे जा रहे थे तो इसमें उनका अपना कोई स्वार्थ थोड़े था.वो तो जिंदल और उसके भाई-बंधुओं को हम पहाड़ियों के विकास की चिंता सता रही थी.तो भाई जिंदल हमारा विकास करना चाहेगा तो उसे हमारी जमीन कौन देगा ?वही जिसकी गाँव-गाँव की जमीनों पर काग दृष्टि हो ! जिसे जमीन का पता ही नहीं,वह जमीन क्या खाक लुटवायेगा !हमारे विकास के लिए तो छीनी जा रही हैं,हमारी जमीने.हरीश रावत हम बैकवर्ड पहाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय स्कूल दिखवाना चाहते हैं.सुना नहीं रावत साहब का ऐलान कि हमारी जमीन पर बनने वाले इस अन्तरराष्ट्रीय स्कूल में हम पहाड़ी ही तो बाबू-चपरासी बनेंगे.कितनी कृपा है हरीश रावत ज्यू की हम पहाड़ियों पर.वरना जो जिंदल बाउंसर ला सकता है,दिल्ली-हरियाणा से,उसके लिए चपरासी लाना कौन सी मुश्किल बात है.भाई इसी लिए तो राज्य बनाया था कि पहाड़ के आदमी को बर्तन मांजने और चपरासी बनने के लिए घर छोड़ना पड़ता था.धरती पुत्र हरीश रावत ये सुभीता, ऐन पहाड़ में,नैनिसार जैसी जगहों पर करवा दे रहे हैं.अगर ये बाउंसर लाये हैं तो अपने लिए थोड़े ही लाये हैं,ये तो हमारे विकास की खातिर लाये हैं.ये हमारा सिर फोड़ देंगे पर हमारा विकास कर के रहेंगे.हम जेल डालना पड़े या कि हमें गोली मारनी पड़े,हमारा विकास,ये किसी कीमत पर रुकने नहीं देंगे. हे विकास के दैत्य,तेरी और तेरे बाउंसरों की ऐसी-तैसी…

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