गेहूं से आयात शुल्क हटाने के विरोध में कार्यक्रम

मोदी सरकार ने अब चंद दिन पहले गेहूं से आयात शुल्क हटाने का फैसला लिया है जिसने उत्तर भारत के किसानों की रीढ़ तोड़ दी है, इस फैसले के बाद किसानों में एक निराशा का माहौल है। इस फैसले से मोदी सरकार की किसान विरोधी छवि पुख्ता हो रही है जिसकी शुरुआत भूमि अध्यादेश से हुई थी। आयात शुल्क हटने के बाद लाखों टन गेहूं विदेश से हिंदुस्तान में आना शुरू हो गया है, इस गेहूं के आयात से भारत के किसानों द्वारा पैदा किये जा रहे गेहूं की कीमत घट जायेगी और उन्हें न्यूनतम निर्धारित मूल्य से कम में अपना गेहूं बेचना पड़ेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सच में 70 के दौर की हरित क्रांति के बाद हमे विदेश से गेहूं के आयात करने की जरुरत है?
आंकड़ों के अनुसार हिंदुस्तान में हर साल गेहूं की खपत है 87 मिलियन टन, जबकि इस वर्ष 93.5 मिलियन टन गेहूं की पैदावार का अनुमान है जो की जरुरत से 6.5 मिलियन टन ज्यादा है। तो सवाल यह उठता है कि आख़िरकार हमे क्या ज़रूरत है गेहूं का विदेशों से आयात करने की? जब जरुरत से ज्यादा पैदावार हमारे देश में ही हो रही है तो क्यों सरकार बाहर से गेहूं मंगवा के किसानों को बर्बाद करने पर तुली हुई है? भारत के किसानों की पश्चिमी देशों के किसानों से तुलना करना बिलकुल गलत है और पूर्ण रूप से अव्यवहारिक है क्योंकि पश्चिमी देशों की सरकार वहां के किसानों को अरबों रुपए की सब्सिडी सीधे तौर पर देती है। पश्चिमी देशों के किसान को फसल के मूल्य से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वहां की सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी ही वहां के किसानों के आरामदायक जीवन जीने के लिए पर्याप्त है। वहीं दूसरे और भारत के किसानों को ना के बराबर सब्सिडी सरकार से प्राप्त होती है। सिर्फ साल 2010 में यूरोपियन यूनियन ने अपने किसानों को 3.60 लाख करोड़ की सब्सिडी सीधे तौर पर दी थी, वहीँ अमरीका हर साल 1.20 लाख करोड़ की सब्सिडी अपने किसानों को देता है। जबकि भारत में स्थिति ये है कि लाखों करोड़ों रुपए का कॉर्पोरेट घरानों का लोन माफ़ कर दिया जाता है जबकि एक किसान का चंद हज़ार रुपए का क़र्ज़ माफ़ नहीं किया जाता। इस वजह से भारत और पश्चिम के किसानों की तुलना करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। भारत के किसान का जीवनयापन फसल के मूल्य पर निर्भर है जबकि पश्चिमी देश के किसानों का जीवनयापन सब्सिडी पर निर्भर है इसलिए पश्चिमी देशों के किसानों की फसल का मूल्य हमेशा कम ही रहेगा। इस तरह से गेहूं के आयात से एक और खतरा है और वो है हमारी आत्मनिर्भरता का समाप्त हो जाना, जिस तरीके से 90 के दशक में उस समय की सरकार ने खाद्य तेल पर आयात शुल्क को बहुत कम कर के हिंदुस्तान के नारियल व सूरजमुखी की खेती करने वाले किसानों को समाप्त कर दिया गया था, उसी तरीके से अब उत्तर भारत के किसानों के ऊपर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। ये आयात शुल्क खत्म न कर के सरकार को गेहूं के उत्पादन के सही रख-रखाव की और ध्यान देना चाहिए क्योंकि हर वर्ष लाखों टन गेहूं खुले में रखे हुए खराब हो जाता है और वहीँ दूसरी और लाखों लोग हर साल भूखे मर जाते हैं। सरकार को कम से कम 35 फीसदी आयात शुल्क कर देना चाहिए जिससे हमारे यहाँ के किसानों को गेहूं का सही मूल्य मिल सके।
इस मुद्दे पर 19 जनवरी को अनेक संगठनों की मीटिंग का आयोजन नई दिल्ली में किया गया जिसमें 25 से अधिक किसान संगठनों ने भाग लिया।

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